पिछले भाग में हमने एशिया महाद्वीप के राजनीतिक विभाजन का अध्ययन किया था। इस भाग में हम एशिया महाद्वीप के प्रमुख भू-स्वरूपों का विस्तृत परिचय प्राप्त करेंगे। एशिया विश्व का सबसे बड़ा तथा सर्वाधिक जनसंख्या वाला महाद्वीप है, इसलिए इसकी स्थलाकृति अत्यंत विविधतापूर्ण, जटिल और विशिष्ट है। यहाँ हिमाच्छादित ऊँचे पर्वत, विस्तृत पठार, विशाल मैदान, शुष्क मरुस्थल, गहरी झीलें, उपजाऊ नदी-घाटियाँ तथा अनेक सामरिक जलसंधियाँ पाई जाती हैं। यही विविध भू-आकृतियाँ एशिया की जलवायु, वनस्पति, कृषि, व्यापार, जनजीवन, सभ्यताओं और सांस्कृतिक विकास को गहराई से प्रभावित करती हैं।
दोस्तों, धरातल के विभिन्न भू-स्वरूपों पर जलवायु का गहरा प्रभाव पड़ता है। किसी भी महाद्वीप की पर्वत-श्रेणियाँ, पठार, मैदान और जल निकाय वहाँ के तापमान, वर्षा, हवाओं तथा मानव जीवन को प्रभावित करते हैं। एशिया में कर्क रेखा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, भारत, बांग्लादेश, म्यांमार तथा चीन से होकर गुजरती है। इसी कारण एशिया की जलवायु को सामान्यतः दो व्यापक भागों में विभाजित किया जाता है—
उत्तरी एशिया – शीत जलवायु क्षेत्र
दक्षिणी एशिया – उष्ण जलवायु क्षेत्र
उत्तरी एशिया में साइबेरिया जैसे अत्यंत शीत प्रदेश पाए जाते हैं, जहाँ लंबे समय तक हिमपात और अत्यल्प तापमान रहता है। इसके विपरीत दक्षिणी एशिया में उष्णकटिबंधीय और मानसूनी जलवायु पाई जाती है, जो कृषि और मानव बसावट के लिए अत्यंत अनुकूल है। अब हम एशिया के प्रमुख भू-स्वरूपों का क्रमबद्ध अध्ययन करते हैं—
एशिया की प्रमुख झीलें
एशिया महाद्वीप में अनेक महत्वपूर्ण झीलें पाई जाती हैं, जो भौगोलिक, आर्थिक, सामरिक और पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये झीलें केवल जल के भंडार मात्र नहीं हैं, बल्कि स्थानीय जलवायु संतुलन, मत्स्य संसाधन, सिंचाई, परिवहन, जल-विद्युत, पर्यटन तथा जैव विविधता के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एशिया की अनेक प्राचीन सभ्यताओं और मानव बस्तियों का विकास भी झीलों के आसपास हुआ। कुछ झीलें मीठे जल के विशाल स्रोत के रूप में प्रसिद्ध हैं, तो कुछ अपनी अधिक लवणता, खनिज संपदा या विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण विशेष महत्व रखती हैं।
1. बैकाल झील
बैकाल झील रूस के साइबेरिया क्षेत्र में स्थित है। यह विश्व की सबसे गहरी मीठे पानी की झील है, जिसकी अधिकतम गहराई लगभग 1620 मीटर है। इसे विश्व के सबसे प्राचीन और स्वच्छ जलाशयों में भी गिना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी आयु लगभग 2.5 से 3 करोड़ वर्ष मानी जाती है, जिससे यह विश्व की सबसे प्राचीन झीलों में सम्मिलित होती है। इस झील में विश्व के मीठे जल का एक बड़ा भाग सुरक्षित है। बैकाल झील जैव विविधता की दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध है तथा यहाँ अनेक दुर्लभ जलीय जीव पाए जाते हैं। यह झील स्थानीय जलवायु को संतुलित रखने, मत्स्य पालन तथा पर्यटन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2. वान झील
वान झील तुर्की के पठारी भाग में स्थित है। यह खारे पानी की झील है और अपनी अधिक लवणता के लिए प्रसिद्ध है। इसकी क्षारीय प्रकृति इसे अन्य झीलों से भिन्न बनाती है। वान झील ज्वालामुखीय क्षेत्र में स्थित होने के कारण भौगोलिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखती है। इसके जल में सोडा और अन्य खनिज तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे इसकी रासायनिक संरचना विशिष्ट बन जाती है। यह झील स्थानीय पर्यटन, मत्स्य पालन तथा क्षेत्रीय पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण है।
3. मृत सागर
मृत सागर जॉर्डन और इज़राइल के मध्य स्थित है। यह विश्व का सबसे नीचा स्थल भाग माना जाता है, जो समुद्र तल से लगभग 397 मीटर नीचे स्थित है। इसकी लवणता अत्यधिक होने के कारण इसमें सामान्य जलीय जीवन नहीं पाया जाता। यही कारण है कि इसे ‘मृत सागर’ कहा जाता है। इसके जल में खनिज लवणों की मात्रा अत्यधिक होने से इसका जल अत्यंत घना होता है, जिसके कारण मनुष्य इसमें आसानी से तैर सकता है। मृत सागर के तटवर्ती क्षेत्र खनिज संपदा, औषधीय गुणों और स्वास्थ्य पर्यटन के लिए प्रसिद्ध हैं।
4. कैस्पियन सागर
कैस्पियन सागर विश्व की सबसे बड़ी खारे पानी की अंतर्देशीय झील है। यह एशिया और यूरोप के मध्य स्थित है। इसके तटीय क्षेत्रों में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार पाए जाते हैं, जिससे इसका आर्थिक महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। यह झील रूस, कज़ाखस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान और अज़रबैजान से घिरी हुई है। कैस्पियन सागर मत्स्य संसाधनों, विशेषकर कैवियार उत्पादन, के लिए भी प्रसिद्ध है। इसकी सामरिक स्थिति इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति और व्यापार की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है।
5. अरल सागर
अरल सागर उज़्बेकिस्तान और कज़ाखस्तान के मध्य स्थित है। यह कभी एशिया की प्रमुख झीलों में गिनी जाती थी, परंतु अब इसका क्षेत्रफल काफी घट चुका है। अत्यधिक सिंचाई और जल दोहन के कारण यह पर्यावरणीय संकट का उदाहरण बन चुकी है। कभी यह विश्व की चौथी सबसे बड़ी अंतर्देशीय झीलों में गिनी जाती थी, किंतु नदियों के जल को कृषि कार्यों हेतु मोड़ देने से इसका अधिकांश भाग सूख गया। आज अरल सागर का सिकुड़ना पर्यावरणीय असंतुलन, मरुस्थलीकरण और मानव-निर्मित पारिस्थितिक संकट का प्रमुख उदाहरण माना जाता है।
एशिया के प्रमुख पर्वत
एशिया को पर्वतों का महाद्वीप भी कहा जाता है, क्योंकि विश्व की अनेक सर्वोच्च, विस्तृत और प्रभावशाली पर्वत-श्रृंखलाएँ इसी महाद्वीप में स्थित हैं। एशिया की पर्वत प्रणालियाँ न केवल इसकी भौगोलिक संरचना को विशिष्ट बनाती हैं, बल्कि जलवायु, वर्षा, नदियों के उद्गम, खनिज संपदा, प्राकृतिक सीमाओं, वनस्पति, जनजीवन और सभ्यताओं के विकास पर भी गहरा प्रभाव डालती हैं। एशिया की अधिकांश महान नदियाँ इन्हीं पर्वतों से निकलती हैं, इसलिए पर्वतों को इस महाद्वीप की जल-जीवन रेखा भी कहा जाता है। अनेक पर्वत-श्रृंखलाएँ प्राकृतिक अवरोध के रूप में कार्य करती हैं, जो देशों की सीमाएँ निर्धारित करने, हवाओं की दिशा बदलने और वर्षा के वितरण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
1. हिमालय पर्वतमाला
हिमालय विश्व की सबसे ऊँची एवं नवीन वलित पर्वतमाला है, जिसका निर्माण अल्पाइन पर्वतनिर्माण काल में हुआ। इसका सर्वोच्च शिखर माउंट एवरेस्ट (8848 मीटर) नेपाल में स्थित है, जिसे नेपाल में ‘सागरमाथा’ तथा तिब्बत में ‘चोमोलुंग्मा’ कहा जाता है। हिमालय केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया की जीवनरेखा है। यह भारत, नेपाल, भूटान और तिब्बत के प्राकृतिक, जलवायवीय तथा सांस्कृतिक जीवन को गहराई से प्रभावित करता है। हिमालय भारत को मध्य एशिया की शीत हवाओं से बचाता है तथा मानसूनी पवनों को रोककर वर्षा कराने में सहायता करता है। गंगा, यमुना, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी महान नदियों का उद्गम इसी पर्वत से होता है।
2. यूराल पर्वत
यूराल पर्वत रूस में स्थित एक प्राचीन पर्वतमाला है। इसे एशिया और यूरोप के बीच प्राकृतिक सीमा माना जाता है। यह उत्तर से दक्षिण दिशा में फैली हुई है और भूगोल की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यूराल पर्वत प्राचीन चट्टानों से निर्मित है, इसलिए यह खनिज संपदा के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहाँ लौह अयस्क, कोयला, ताँबा तथा अन्य खनिजों के विशाल भंडार पाए जाते हैं, जिससे यह औद्योगिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
3. काकेशस पर्वतमाला
काकेशस पर्वतमाला काला सागर और कैस्पियन सागर के मध्य स्थित है। यह एशिया और यूरोप को अलग करने वाली महत्वपूर्ण पर्वतश्रेणी है। यह पर्वतश्रेणी सामरिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। काकेशस क्षेत्र अनेक जातीय समूहों और संस्कृतियों का संगम स्थल है। इसी पर्वतमाला में माउंट एल्ब्रुस स्थित है, जिसे यूरोप का सर्वोच्च शिखर माना जाता है।
4. अराकान योमा
अराकान योमा पर्वतमाला भारत और म्यांमार की सीमा पर स्थित है। दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी पवनें इसी पर्वतमाला से प्रभावित होकर भारत में वर्षा करती हैं। यह जलवायु नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह पर्वतमाला भारत के पूर्वोत्तर भाग और म्यांमार के मध्य प्राकृतिक सीमा का कार्य भी करती है। यहाँ घने वन, जैव विविधता और आदिवासी संस्कृति का समृद्ध विकास हुआ है।
5. हिंदूकुश पर्वत
हिंदूकुश पर्वतमाला अफगानिस्तान और पाकिस्तान के मध्य विस्तृत है। यह मध्य एशिया की महत्वपूर्ण पर्वतश्रेणी है तथा ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। प्राचीन काल में भारत, मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया के मध्य संपर्क मार्ग इसी क्षेत्र से होकर गुजरते थे। यह पर्वतश्रेणी सामरिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है और इतिहास में अनेक आक्रमणों तथा व्यापारिक मार्गों की साक्षी रही है।
6. सुलेमान पर्वत
सुलेमान पर्वत अफगानिस्तान और पाकिस्तान क्षेत्र में स्थित है। यह शुष्क पर्वतीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी पर्वतीय संरचना कठोर एवं ऊबड़-खाबड़ है। यह क्षेत्र मुख्यतः पशुपालन, जनजातीय जीवन और सीमित कृषि के लिए जाना जाता है। सुलेमान पर्वत क्षेत्र सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
7. अल्ताई पर्वत
अल्ताई पर्वत मंगोलिया, रूस, चीन और कज़ाखस्तान के संगम क्षेत्र में स्थित है और मध्य एशिया की प्रमुख पर्वतश्रेणियों में से एक है। यह पर्वत प्राकृतिक सौंदर्य, हिमनदों, घासभूमियों और जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। अल्ताई क्षेत्र को अनेक मध्य एशियाई संस्कृतियों और घुमंतू जनजातियों का उद्गम क्षेत्र भी माना जाता है।
8. नानशान पर्वत
नानशान पर्वत चीन के उत्तरी भाग में स्थित है। यह चीन की आंतरिक स्थलाकृति को प्रभावित करता है। यह पर्वतश्रेणी चीन के शुष्क और अर्ध-शुष्क भागों की जलवायु को नियंत्रित करने में सहायक है। नानशान क्षेत्र चीन के अंत:स्थलीय जल-विभाजक क्षेत्र के रूप में भी महत्वपूर्ण है।
9. अरारात पर्वत
अरारात पर्वत तुर्की में स्थित एक प्रसिद्ध पर्वत है। यह ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से भी प्रसिद्ध है। यह ज्वालामुखीय मूल का पर्वत है और बाइबिल परंपरा में नूह की नाव से संबंधित माना जाता है। अरारात पर्वत तुर्की की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण प्रतीक भी है।
एशिया के प्रमुख पठार
एशिया में विश्व के कुछ सबसे ऊँचे, विस्तृत और भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण पठार पाए जाते हैं। ये पठार केवल ऊँचे समतल भू-भाग ही नहीं हैं, बल्कि जलवायु नियंत्रण, पशुपालन, खनिज संपदा, कृषि, मानव बसावट तथा सभ्यताओं के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एशिया के अधिकांश पठार पर्वतों से घिरे हुए हैं और इनकी ऊँचाई, जलवायु तथा संसाधन इन्हें विशेष बनाते हैं। अनेक पठार खनिज संपदा से समृद्ध हैं, जबकि कुछ पठार कठोर जलवायु और विरल जनसंख्या के कारण विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र माने जाते हैं। एशिया के पठारों ने न केवल प्राकृतिक संरचना को प्रभावित किया है, बल्कि यहाँ के आर्थिक जीवन, सांस्कृतिक परंपराओं और सामरिक महत्व को भी गहराई से आकार दिया है।
1. पामीर का पठार
पामीर का पठार ताजिकिस्तान और चीन के शिंजियांग क्षेत्र में स्थित है। इसे विश्व का सबसे ऊँचा पठार माना जाता है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 20,000 फीट है। इसे फारसी में ‘बाम-ए-दुनिया’ अर्थात ‘दुनिया की छत’ कहा जाता है। यह पठार एशिया की पर्वतीय संरचना का केंद्रीय गांठ क्षेत्र माना जाता है, क्योंकि यहाँ से अनेक पर्वत-श्रेणियाँ विभिन्न दिशाओं में निकलती हैं। उत्तर में तियानशान, पूर्व में कुनलुन, दक्षिण में कराकोरम और हिमालय, तथा पश्चिम में हिंदूकुश पर्वतमाला इसी क्षेत्र से संबद्ध मानी जाती हैं। पामीर का पठार सामरिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और पूर्वी एशिया के संपर्क क्षेत्र में स्थित है।
2. अनातोलिया का पठार
अनातोलिया का पठार तुर्की में पोंटिक और टॉरस पर्वतों के मध्य स्थित है। यह तुर्की का प्रमुख कृषि, व्यापार और बसावट क्षेत्र है। इस पठार की जलवायु मिश्रित प्रकृति की है, जहाँ भूमध्यसागरीय तथा महाद्वीपीय दोनों प्रकार की जलवायु का प्रभाव देखा जाता है। अनातोलिया क्षेत्र ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, क्योंकि प्राचीन काल से यह एशिया और यूरोप के मध्य सांस्कृतिक सेतु का कार्य करता रहा है। यहाँ गेहूँ, जौ, अंगूर और जैतून की खेती व्यापक रूप से की जाती है।
3. तिब्बत का पठार
तिब्बत का पठार विश्व का सबसे बड़ा और अत्यधिक ऊँचाई वाला पठार है। यह हिमालय, कराकोरम और कुनलुन पर्वतों के मध्य स्थित है। इसे ‘विश्व की छत’ भी कहा जाता है। इसकी औसत ऊँचाई लगभग 4,500 मीटर से अधिक है, जिसके कारण यहाँ का जलवायु क्षेत्र अत्यंत शीत और विरल जनसंख्या वाला है। तिब्बत का पठार एशिया की अनेक महान नदियों का उद्गम स्थल है। यांग्त्सी, ह्वांगहो, सिंधु, ब्रह्मपुत्र और मेकांग जैसी नदियाँ इसी क्षेत्र से निकलती हैं। इस कारण तिब्बत का पठार एशिया का ‘जल-स्रोत क्षेत्र’ भी कहलाता है।
4. अरब का पठार
अरब का पठार अरब प्रायद्वीप में स्थित है। यह शुष्क एवं रेतीला पठारी क्षेत्र है, जिसमें रूब-अल-खाली मरुस्थल स्थित है। यह क्षेत्र अत्यंत शुष्क जलवायु, अल्प वर्षा और मरुस्थलीय परिस्थितियों के लिए प्रसिद्ध है। अरब का पठार पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडारों के कारण विश्व की अर्थव्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों ने खानाबदोश जीवन, ऊँट पालन और मरुस्थलीय संस्कृति को जन्म दिया है।
5. दक्कन का पठार
दक्कन का पठार भारत के प्रायद्वीपीय भाग में स्थित है। यह एक प्राचीन लावा निर्मित पठार है और भारत की कृषि तथा खनिज संपदा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका निर्माण ज्वालामुखीय उद्गारों से हुआ था, इसलिए इसकी मिट्टी काली और उपजाऊ पाई जाती है, जो कपास उत्पादन के लिए अत्यंत उपयुक्त है। दक्कन का पठार भारत की प्राचीन भौगोलिक इकाइयों में से एक है और यह लौह अयस्क, मैंगनीज, अभ्रक तथा बॉक्साइट जैसे खनिजों से समृद्ध है। यह पठार दक्षिण भारत की नदियों, कृषि, उद्योग और मानव बसावट का प्रमुख आधार है।
एशिया की प्रमुख नदियाँ
एशिया की नदियाँ यहाँ की सभ्यताओं की जीवनरेखा रही हैं। प्राचीन काल से ही मानव सभ्यताओं का विकास प्रायः नदी घाटियों में हुआ, क्योंकि नदियाँ जल, उपजाऊ मिट्टी, परिवहन, व्यापार और भोजन का प्रमुख स्रोत रही हैं। एशिया की नदियों ने न केवल कृषि और मानव बसावट को विकसित किया, बल्कि अनेक महान सभ्यताओं, संस्कृतियों और राज्यों के निर्माण में भी केंद्रीय भूमिका निभाई। इन नदियों के तटों पर नगर विकसित हुए, व्यापारिक मार्ग बने और सांस्कृतिक परंपराएँ फली-फूलीं। एशिया की अधिकांश नदियाँ पर्वतीय क्षेत्रों से निकलकर विस्तृत मैदानों को सींचती हुई समुद्र में मिलती हैं, जिससे वे आर्थिक और पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाती हैं।
1. यांग्त्सी नदी
यांग्त्सी एशिया और चीन की सबसे लंबी नदी है। इसकी लंबाई लगभग 5557 किलोमीटर है। चीन का प्रसिद्ध नगर शंघाई इसी नदी के तट पर स्थित है। यह चीन की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा मानी जाती है। यांग्त्सी नदी का उद्गम तिब्बत के उच्च पर्वतीय क्षेत्र से होता है और यह पूर्व की ओर बहते हुए पूर्वी चीन सागर में गिरती है। यह नदी चीन के कृषि, उद्योग, परिवहन और जल-विद्युत उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी नदी पर विश्व प्रसिद्ध ‘थ्री गॉर्जेस बाँध’ स्थित है, जो जल-विद्युत उत्पादन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2. सीक्यांग नदी
सीक्यांग नदी चीन की प्रमुख नदियों में से एक है। इसका अपवाह क्षेत्र चावल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यह दक्षिणी चीन की आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण नदी है और इसके मैदान अत्यधिक उपजाऊ हैं। सीक्यांग नदी व्यापार, सिंचाई और अंतर्देशीय जल परिवहन के लिए उपयोगी है। इसके डेल्टा क्षेत्र में घनी जनसंख्या और अनेक औद्योगिक नगर विकसित हुए हैं।
3. ह्वांगहो नदी
ह्वांगहो नदी उत्तरी चीन की प्रमुख नदी है। इसे ‘पीली नदी’ भी कहा जाता है क्योंकि यह लोएस मिट्टी वाले क्षेत्र से होकर बहती है। बार-बार मार्ग बदलने के कारण इसे ‘चीन का शोक’ कहा जाता है। यह नदी चीन की प्राचीन सभ्यता का पालना मानी जाती है। इसके तटों पर चीन की आरंभिक कृषि सभ्यता का विकास हुआ था। लोएस मिट्टी के कारण इसका जल पीला दिखाई देता है और यही मिट्टी इसे अत्यंत उपजाऊ बनाती है, किंतु अत्यधिक गाद के कारण बाढ़ की समस्या भी उत्पन्न होती है।
4. सिंधु नदी
सिंधु नदी तिब्बत क्षेत्र से निकलकर भारत और पाकिस्तान से होते हुए अरब सागर में गिरती है। सिंधु घाटी सभ्यता का विकास इसी नदी के तट पर हुआ। यह दक्षिण एशिया की सबसे ऐतिहासिक नदियों में से एक है। सिंधु नदी और इसकी सहायक नदियों ने उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि, व्यापार और नगरीय सभ्यता को विकसित किया। पाकिस्तान की सिंचाई व्यवस्था का आधार भी मुख्यतः सिंधु नदी तंत्र ही है।
5. गंगा नदी
गंगा भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदी है। इसका उद्गम गंगोत्री हिमनद से होता है। यह धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की सांस्कृतिक धुरी है। इसके तटों पर हरिद्वार, प्रयागराज, वाराणसी और कोलकाता जैसे प्रमुख नगर स्थित हैं। गंगा का मैदान विश्व के सबसे उपजाऊ कृषि क्षेत्रों में से एक है, जहाँ घनी जनसंख्या निवास करती है। यह नदी सिंचाई, पेयजल, परिवहन और धार्मिक जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
6. ब्रह्मपुत्र नदी
ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत, भारत और बांग्लादेश से होकर बहती है तथा अंततः बंगाल की खाड़ी में गिरती है। यह विशाल जलराशि और उपजाऊ बाढ़ मैदानों के लिए प्रसिद्ध है। तिब्बत में इसे ‘सांगपो’ कहा जाता है। यह नदी असम के मैदानों को सींचती है और बांग्लादेश में गंगा के साथ मिलकर विशाल डेल्टा का निर्माण करती है। ब्रह्मपुत्र नदी जल-समृद्धि, जल-परिवहन, मत्स्य पालन और कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, यद्यपि इसकी बाढ़ अनेक बार विनाशकारी भी सिद्ध होती है।
सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों ने मिलकर विश्व के सबसे उपजाऊ मैदानों में से एक ‘सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान’ का निर्माण किया है। यह मैदान घनी जनसंख्या, उन्नत कृषि, प्राचीन सभ्यता और आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है।
एशिया की प्रमुख जलसंधियाँ
एशिया की जलसंधियाँ समुद्री व्यापार, सामरिक नियंत्रण, नौवहन, अंतरराष्ट्रीय संपर्क तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जलसंधि वह संकीर्ण समुद्री मार्ग होता है, जो दो बड़े जल निकायों को जोड़ता है और समुद्री परिवहन के लिए प्राकृतिक द्वार का कार्य करता है। एशिया की अनेक प्रमुख जलसंधियाँ विश्व व्यापार की धुरी मानी जाती हैं, क्योंकि इनके माध्यम से तेल, गैस, खाद्यान्न, औद्योगिक वस्तुएँ तथा अन्य आवश्यक संसाधनों का विशाल समुद्री परिवहन होता है। इन जलसंधियों का महत्व केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि सामरिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत गहरा है। अनेक शक्तिशाली राष्ट्र इन जलमार्गों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए विशेष रणनीतिक रुचि रखते हैं।
1. मलक्का जलसंधि
मलक्का जलसंधि मलेशिया और इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप के मध्य स्थित है। यह दक्षिण चीन सागर को अंडमान सागर से जोड़ती है। यह विश्व की सबसे व्यस्त समुद्री जलसंधियों में से एक है। एशिया, यूरोप और अफ्रीका के मध्य होने वाला समुद्री व्यापार बड़े पैमाने पर इसी मार्ग से होकर गुजरता है। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे औद्योगिक देशों के लिए यह जलसंधि ऊर्जा आपूर्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है। इसकी सामरिक स्थिति के कारण इसे विश्व व्यापार की ‘जीवनरेखा’ भी कहा जाता है।
2. सुंडा जलसंधि
सुंडा जलसंधि सुमात्रा और जावा द्वीपों के मध्य स्थित है। यह जावा सागर को हिंद महासागर से जोड़ती है। यह इंडोनेशिया के द्वीपीय भाग में स्थित एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यद्यपि इसका उपयोग मलक्का जलसंधि की तुलना में कम होता है, फिर भी यह वैकल्पिक समुद्री मार्ग के रूप में महत्वपूर्ण है। ज्वालामुखीय गतिविधियों और भूकंपीय संवेदनशीलता के कारण यह क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
3. पाक जलसंधि
पाक जलसंधि भारत और श्रीलंका के मध्य स्थित है। यह मन्नार की खाड़ी को बंगाल की खाड़ी से जोड़ती है। यह दक्षिण एशिया की एक महत्वपूर्ण जलसंधि है और भारत-श्रीलंका समुद्री संपर्क का प्रमुख मार्ग है। ऐतिहासिक रूप से यह जलमार्ग व्यापार, सांस्कृतिक संपर्क तथा समुद्री आवागमन के लिए महत्वपूर्ण रहा है। इसकी उथली गहराई के कारण बड़े जहाजों का आवागमन सीमित है, फिर भी इसका क्षेत्रीय महत्व अत्यधिक है।
4. कोको जलसंधि
कोको जलसंधि म्यांमार के कोको द्वीप और भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के मध्य स्थित है। यह बंगाल की खाड़ी को अंडमान सागर से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण सामरिक समुद्री मार्ग है। हिंद महासागर क्षेत्र में इसकी स्थिति अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है। भारत की सामुद्रिक सुरक्षा और पूर्वी समुद्री निगरानी की दृष्टि से यह जलसंधि विशेष महत्व रखती है।
5. ग्रेट चैनल
ग्रेट चैनल अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और इंडोनेशिया के मध्य स्थित है। यह हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री मार्गों को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण जलमार्ग है। सामरिक दृष्टि से यह भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा, नौसैनिक उपस्थिति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों की निगरानी में सहायक है।
एशिया के प्रमुख मरुस्थल
एशिया में गर्म और शीत दोनों प्रकार के मरुस्थल पाए जाते हैं। ये मरुस्थल केवल शुष्क और निर्जन भू-भाग नहीं हैं, बल्कि जलवायु, वनस्पति, पशुपालन, मानव जीवन, व्यापारिक मार्गों तथा सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एशिया के मरुस्थलों की भौगोलिक संरचना, जलवायु और संसाधन इन्हें विशिष्ट बनाते हैं। कुछ मरुस्थल अत्यधिक गर्म और शुष्क हैं, जबकि कुछ मरुस्थल अत्यधिक ठंडे, पथरीले और विरल जनसंख्या वाले हैं। इन मरुस्थलों ने स्थानीय जीवन-शैली, आवास, परिवहन, पशुपालन तथा व्यापारिक गतिविधियों को गहराई से प्रभावित किया है।
1. टकलामकान मरुस्थल
टकलामकान मरुस्थल चीन के शिंजियांग क्षेत्र में स्थित है। यह एशिया का प्रमुख शुष्क मरुस्थल है। यह तारिम बेसिन में स्थित विशाल रेतीला मरुस्थल है, जिसके चारों ओर पर्वत-श्रृंखलाएँ पाई जाती हैं। टकलामकान मरुस्थल अपनी अत्यधिक शुष्कता, विशाल बालू-टीलों और कठोर जलवायु के लिए प्रसिद्ध है। यह मरुस्थल ऐतिहासिक रूप से रेशम मार्ग के लिए भी महत्वपूर्ण रहा है, क्योंकि इसके उत्तरी और दक्षिणी किनारों से होकर प्राचीन व्यापारिक मार्ग गुजरते थे।
2. अरब मरुस्थल
अरब मरुस्थल अरब प्रायद्वीप के अधिकांश भाग में विस्तृत है। यह विश्व के प्रमुख गर्म मरुस्थलों में से एक है। यह मरुस्थल अत्यधिक तापमान, अल्प वर्षा और विस्तृत रेतीले मैदानों के लिए प्रसिद्ध है। अरब मरुस्थल में रूब-अल-खाली (Empty Quarter) नामक क्षेत्र स्थित है, जो विश्व के सबसे विशाल रेतीले मरुस्थलों में से एक है। यहाँ की जलवायु ने खानाबदोश जीवन, ऊँट पालन और मरुस्थलीय संस्कृति को विकसित किया है। साथ ही यह क्षेत्र पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस संसाधनों के कारण विश्व अर्थव्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
3. गोबी मरुस्थल
गोबी मरुस्थल मंगोलिया और चीन में स्थित है। यह एक शीत मरुस्थल है और तापमान की अत्यधिक विषमता के लिए प्रसिद्ध है। यह मरुस्थल अन्य मरुस्थलों की भाँति पूर्णतः रेतीला नहीं है, बल्कि यहाँ पथरीले, कंकरीले और शुष्क मैदान अधिक पाए जाते हैं। शीत ऋतु में यहाँ अत्यधिक ठंड तथा ग्रीष्म ऋतु में तीव्र गर्मी पड़ती है। गोबी मरुस्थल जीवाश्मों, प्रागैतिहासिक अवशेषों तथा दुर्लभ वन्यजीवों के लिए भी प्रसिद्ध है। यह मरुस्थल मध्य एशिया की जलवायु और घुमंतू जीवन-शैली को प्रभावित करता है।
4. थार मरुस्थल
थार मरुस्थल भारत और पाकिस्तान में विस्तृत है। भारत में इसे ‘ग्रेट इंडियन डेजर्ट’ तथा पाकिस्तान में ‘चोलिस्तान’ कहा जाता है। यह जनसंख्या और सांस्कृतिक दृष्टि से विश्व के सर्वाधिक जीवंत मरुस्थलों में से एक है।
इस प्रकार एशिया महाद्वीप विविध भू-आकृतियों से समृद्ध है। यहाँ की पर्वतमालाएँ, पठार, नदियाँ, झीलें, जलसंधियाँ और मरुस्थल न केवल इसकी भौगोलिक संरचना को विशिष्ट बनाते हैं, बल्कि यहाँ की जलवायु, कृषि, व्यापार, परिवहन, सभ्यताओं और सांस्कृतिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एशिया की भौगोलिक विविधता ही इसे विश्व का सबसे विशिष्ट और प्रभावशाली महाद्वीप बनाती है।
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